जब से मामला सुप्रीम कोर्ट में आया है, संविधान का सबसे अप्रसिद्ध और अनसुना Article 35A आजकल एक ज्वलंत मुद्दा बनकर सभी की जुबान पर छाया हुआ है। अधिकतर विधि के छात्र भी इस आर्टिकल से अंजान थे। यहां तक कि संविधान के "Bare Text" में भी इसका कोई जिक्र नहीं है।
अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर को मिले स्पेशल स्टेटस के बारे में तो लोगों को पता है पर अनुच्छेद 35A से वो आज भी अनभिज्ञ हैं।
मैं बहुत ही सरल भाषा में आपको इसके बारे में समझाने की कोशिश कर रही हूँ।
आख़िर क्या है अनुच्छेद 35A?
अनुच्छेद 35A जम्मू कश्मीर की विधायिका को यह तय करने की पूरी आजादी देता है कि जम्मू कश्मीर के "स्थायी निवासी" कौन लोग होंगे। यहां तक की इस अनुच्छेद के अंतर्गत स्थायी निवासियों की नौकरी, ज़मीन, जायदाद, छात्रवृत्ति, सरकारी सहायता, सामाजिक सुरक्षा आदि से सम्बंधित विशेषाधिकार पर भी कानून बनाने की उन्हें पूरी आज़ादी है। इन पर बनाये गए नियम चाहे संविधान के किसी भी प्रावधान या मौलिक अधिकार या भारत के किसी भी कानून का हनन करें, हम कोर्ट में जाकर उसे चुनौती नहीं दे सकते। यूं कह लें कि आर्टिकल 35A क़ानूनन हमारे मौलिक अधिकारो (याने Fundamental Rights) के हनन का एक लाइसेंस है।
अनुच्छेद 35A अस्तित्व में कैसे आया?
पंडित जवाहरलाल नेहरु एवं शेख अब्दुल्ला के बीच हुए 1952 के "दिल्ली समझौते" के बाद भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के आदेश (Application to Jammu and Kashmir Order, 1954) के पारित होने के पश्चात यह विवादित Article 35A हमारे संविधान का हिस्सा बना। यह एक इकलौता संवैधानिक संशोधन था जो बिना संसद में पारित हुए , राष्ट्रपति के आदेश से अस्तित्व में आया।
26 जनवरी 1957 को अस्तित्व में आये जम्मू कश्मीर के संविधान के सेक्शन 6 में "स्थाई निवासी" को परिभाषित किया गया।
विवाद
इन सत्तर सालों तक अनुच्छेद 35A को अंधेरे में रखा गया, न तो यह पाठ्यक्रम का हिस्सा रहा और न ही संविधान की किताबों में इसे कोई जगह दी गयी। किताबों में तो अनुच्छेद 35 के बाद सीधे अनुच्छेद 36 आ जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 368 (i) के हिसाब से संविधान में कोई भी संशोधन केवल और केवल हमारी संसद ही कर सकती है। अब प्रश्न यह है कि आखिर राष्ट्रपति ने कैसे अपने आदेश से इतना बड़ा संशोधन हमारे संविधान में कर डाला? क्या उन्हें ऐसा करने का अधिकार था? या फिर यह आदेश उन्होंने अपने अधिकार के बाहर जाकर किया? और आख़िर क्यों नेहरू सरकार ने इस संशोधन को निर्णय के लिए संसद के समक्ष नहीं रखा?
इन्हीं सब कारणों से इस अनुच्छेद की वैधता को पूरनलाल लखनलाल बनाम प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया (1961) के केस में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी जिसपर 5 जजों की बेंच ने अपना फैसला सुनाया। अपने निर्णय में न्यायिक बेंच ने इस आर्टिकल और इसके दुष्पप्रभाव की जमकर अवहेलना तो की पर ऐतिहासिक गलती करते हुए इसे वैध करार दे दिया। कोर्ट का आधार था कि संविधान का अनुच्छेद 370 (1) (d) राष्ट्रपति को पूर्ण अधिकार देता है कि वो जम्मू कश्मीर के "State Subjects" के कल्याण के लिए संविधान में कुछ "अपवाद और संशोधन" (exceptions and modifications) कर सकते है। पर सवाल यह है कि क्या इससे राष्ट्रपति को संविधान में संरक्षित नागरिकों के मौलिक अधिकार के हनन करने वाले संशोधन करने का भी अधिकार मिल जाता है?
आर्टिकल 35A का प्रभाव
हास्यास्पद बात तो यह है कि उस समय भारत में दो प्रधानमंत्री थे। भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला। जम्मू कश्मीर सरकार ने वहां के कुछ ही निवासियों को परमानेंट रेसिडेंट सर्टिफिकेट (PRC) जारी करना शुरू कर दिया। सिर्फ PRC होल्डर्स को ही नागरिकता, वोटिंग राइट्स आदि मिले।
यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर) और अनुच्छेद 19(1)(e) (भारत के किसी भी हिस्से में रहने और बसने का अधिकार) का हनन करता है। आर्टिकल 15 का हनन करते हुए यह PRC सिस्टम, जन्म के स्थान के आधार पर भी नागरिकों में भेदभाव करता है। बिना किसी संशय के असंवैधानिक होने के बावजूद यह PRC सिस्टम आज भी आर्टिकल 35A की सुरक्षा के घेरे में लगातार क़ानूनन नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहा है।
पीड़ित कौन?
PRC सिस्टम लागू होने से जम्मू कश्मीर में रहने वाले कई समूह प्रभावित हुए हैं। शेख अब्दुल्ला के इस साम्प्रदायिक एजेंडे में कश्मीर के अल्पसंख्यकों के लिए कोई जगह नहीं थी। जिन बाशिंदों को जम्मू कश्मीर सरकार ने PRC जारी नहीं किये वो अपने मौलिक तो छोड़िए सामान्य अधिकारों के लिए भी आज भी संघर्षरत हैं। सबसे अधिक प्रभावित हैं : गोरखा, वाल्मीकि और पश्चिमी पाकिस्तान से पलायन करके आये लोग।
गोरखा
1846 में महाराजा गुलाब सिंह द्वारा अस्तित्व में लाये गए रियासत जम्मू कश्मीर की सेना में शुरुआत से ही गोरखा सैनिकों का अहम योगदान रहा है। इसके पूर्व भी गोरखा सैनिक सिख राजाओं के नेतृत्व में लगातार कश्मीर को अपनी सेवाएं देते रहे। भारत पाकिस्तान बंटवारे के बाद पाकिस्तानी कबाइलियों से कश्मीर की रक्षा करने में भी बहादुर गोरखा सैनिकों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
दो सौ वर्षो से ज़्यादा से कश्मीर का निवासी होने के बावजूद जम्मू कश्मीर सरकार ने गोरखाओं को PRC जारी करने से मना कर दिया और एक लाख से अधिक गोरखा अपने पूर्वजों के बलिदान की कहानी कहती कश्मीर की धरती पर एक रिफ्यूजी की भांति रहने के लिए मजबूर हो गए।
न वो जम्मू कश्मीर में कोई सम्पत्ति या जमीन खरीद सकते हैं, न उनके बच्चे किसी कॉलेज में दाखिला ले सकते हैं और न ही वो कोई सरकारी नौकरी कर सकते हैं। वो अपनी जगह पर दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर हैं। नेहरू ने उनकी समस्याओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया और शेख अब्दुल्ला ने उन्हें नागरिकता देनें के खोखले वादे किये।
वाल्मीकि समुदाय
आज भी हजारों की संख्या में कश्मीर में रह रहे वाल्मीकि जो कि दलित समुदाय से आते है छुआछूत का शिकार हैं। 1957 में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के बाद जम्मू कश्मीर सरकार ने उन्हें PRC में कुछ छूट देने का वादा किया था। छूट तो मिली पर अधिक से अधिक एक सरकारी सफाई कर्मचारी बनने की।
आज 60 सालों बाद वाल्मीकि समाज की तीसरी और चौथी पीढ़ी पढ़ लिखकर स्नातक और परास्नातक तो हो गयी है पर इस अनुच्छेद 35A के प्रकोप के कारण अपने पूर्वजों की भांति वो भी सिर्फ एक सफाईकर्मचारी बनकर रह गए हैं।
वो लोकसभा चुनाव में तो वोट डाल सकते हैं पर विधान सभा में न उन्हें वोट डालने का अधिकार है और न ही सफ़ाई कर्मचारी से ज्यादा की नौकरी का अधिकार।
दुःख तो इस बात का है कि किसी भी राजनैतिक पार्टी, सामाजिक संगठन या फिर "सो कॉल्ड प्रोग्रेसिव इंटेलेक्चुअल्स" को इनकी चिंता नहीं है।
पश्चिमी पाकिस्तानी रिफ्यूजी
1947 के विभाजन के बाद हुई हिंसा के बाद हजारों हिन्दू परिवार जम्मू कश्मीर में पलायन करने को मजबूर हो गए थे।
5,764 परिवार जिनमें 47,215 लोग (अधिकतर शेड्यूल कास्ट) थे, को रिफ्यूजी की तरह बसाया गया।
सरकार ने उन्हें रहने के लिए कोई ज़मीन नहीं दी। वो ज़मीन के जिन छोटे टुकड़ों में रहते थे उन्हें उन टुकड़ों पर रहने की इजाजत दे दी गयी पर वो उस ज़मीन को बेच नहीं सकते हैं।
साठ सालों बाद आज उनकी संख्या करीब तीन लाख होने के बावजूद वो एक दोयम दर्जे के नागरिक की तरह जिंदगी बसर करने को मजबूर हैं। आज भी वो भूमिहीन मजदूर हैं जिनके पास न वोट देने का अधिकार है और न नौकरी पाने का। मुख्यतः दलित होने के बावजूद किसी भी दलितों के आवाज़ बनने वाले संगठन की आवाज़ कश्मीर तक नही पहुच रही !
न उनके बच्चे स्कूल से आगे की पढ़ाई कर सकते हैं और न उनकी भलाई के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा योजना है। यह सब बिल्कुल पाकिस्तानी घुसपैठियों के उलट है जिन्हें सरकार ने खुद कश्मीर में सेटल किया।
शेख अब्दुल्ला ने इनसे भी सिर्फ खोखले वादे किये। अधिकारों के लिए ये लोग आज भी संघर्षरत हैं।
आज जब बांग्लादेशी घुसपैठियों को भी सभी अधिकारों के साथ बंगाल और असम में ज़मीन मिल गई है तब इन तीन लाख लोगों का अपनें ही देश में एक रिफ्यूजी की तरह रहना एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है।
औरतें
जम्मू कश्मीर की नागरिकता और उत्तराधिकार के कानून भी लिंगभेद करते हैं। एक PRC होल्डर महिला और गैर PRC होल्डर पुरूष से हुई संतान को उत्तराधिकार और PRC का कोई अधिकार नहीं। वहीं दूसरी तरफ एक PRC होल्डर पुरूष और गैर PRC होल्डर महिला से हुई संतान को कश्मीरी नागरिक के सभी अधिकार प्राप्त हैं।
मतलब एक महिला के पास अपनी पसंद से शादी करने की चॉयस (choice) नहीं है पर पुरूष के पास इस हद तक है कि वो लगातार पाकिस्तानी महिलाओं से निक़ाह करते आ रहे हैं।
भारत के महिलावादी लोग इस लिंगभेद पर चुप्पी साधे हुए है !
वर्तमान स्थिति
आज कश्मीर के ये लाखों लोग आशा के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर टकटकी लगाये देख रहे हैं। "We the People" NGO और चारु वली खन्ना की पेटिशन के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुनने के लिए तीन जजों की बेंच का गठन किया है।
NGO की पेटिशन के मुताबिक अनुच्छेद 35A संविधान की आत्मा के ही खिलाफ हैं क्योंकि यह नागरिकता की एक अलग क्लास का निर्माण करता है। हम सभी सिर्फ और सिर्फ भारतीय नागरिक हैं। किसी और नागरिकता का सवाल ही नहीं उठता। नागरिकों को दूसरे राज्य में संपत्ति खरीदने या रोजगार करने से रोकना आर्टिकल्स 14, 19 और 21 में सुरक्षित मौलिक अधिकारों का हनन करता है।
चारु वली खन्ना की याचिका के मुताबिक आर्टिकल 35A Gender Discrimantory अर्थात लिंगभेदी है क्योंकि एक PRC होल्डर लड़की के Non PRC होल्डर लड़के से शादी करने पर यह प्रॉपर्टी के अधिकार भी छीन लेता है। उनके बच्चों को PRC न देकर वह उन्हें illegitimate children का दर्जा देते हैं।
35A कैसे रिपील किया जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट इसे असंवैधानिक करार दे सकती है।
राष्ट्रपति द्वारा उसी तरह के दूसरे आदेश से या फिर संसद के दोनों सदनों द्वारा संशोधन पारित करके इसे रिपील किया जा सकता है। अधिकतर लोग इस तरह के भेदभाव के खिलाफ हैं इसलिए किसी का भी आर्टिकल 35A का समर्थन करना तर्कसंगत नहीं है। राजनैतिक दल सिर्फ वोट बैंक के लिए इसका समर्थन कर सकते हैं।
बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी है। किसी भी सिविल सोसाइटी मेंबर, सामाजिक कार्यकर्ता, दलितों के मसीहा या महिलावादी द्वारा गोरखा, वाल्मीकि, पश्चिमी पाकिस्तानी रिफ्यूजी और कश्मीरी औरतों के इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर नहीं उठाया गया।
हमारे संविधान के वास्तुकार डॉ भीमराव अंबेडकर भी नहीं चाहते थे कि जम्मू कश्मीर को कोई विशेष दर्जा मिले जो हमारे संविधान की आत्मा के ही खिलाफ हो।
अभी हमारे देश में बहुमत से बनी सरकार है, लोग भी अपने अधिकारों को लेकर सजग हैं, यह सही वक्त है जब ऐतिहासिक गलतियों को सुधारा जा सकता है।
उम्मीद है वह दिन भी जल्द ही आएगा जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक हम सभी सिर्फ और सिर्फ भारत के नागरिक होंगे। हम सब एक बराबर होंगे।